
Child migrants often have to migrate from one place to another with their parents. This bereft them of proper nutrition, hygiene, and education. The three pillars which can make them rise in life. These problems are the results of apparent poverty and constant migration. Similar are the problems of many poor orphan children and children of working poor single parents. Neither of these are unsolvable. What it needs is our helping hands.
After the EduCare programme for the underprivileged kids, Rostrum India Social Organisation is now taking the initiative even further. We are trying to set up a shelter home for child migrants and orphans where they can live, learn, and grow comfortably. This initiative will not only provide them stability in terms of residence but will also deliver proper nutrition, healthcare, and quality education to them. The children will be nurtured in an environment which will make them assets for the nation and society in the times to come.
Sounds difficult? Well, you can make it all happen just by doing your small bit. You can contribute to the bright future these children can have through one time or monthly donations, food grains or other in-kind donations, and volunteering. Sow the seed of the dreams of that these kids should have and help them strife towards it!
If you lend your support to make the life of these kids better, you’ll become a part of the joy they’ll have, the heights they’ll reach, the contribution they’ll do to make world a better place. You will be the cause of all of it and much more. You bring the smile on their faces and glitters in their honest eyes today, and someday, they’ll bring that to yours. That day you’ll proud of what you did.
For donations:
You also receive income tax benefits when you donate.

सड़क लोगों के लिए बनती हैं या गाड़ियों के लिए? अगर सड़क लोगो के लिए ही है, जैसा कि सारी नीतियां कहती हैं, तो फिर ये दो-चार पहिये वाली गाड़ियों के पास ही सारा सड़कों का स्थान, सुरक्षा और सुविधा क्यों है और क्यों कोई भी ऐसी गाड़ियां दो पैर वाले पैदल चल रहे लोगो को हॉर्न और ताकत के बल पे किनारे लगाते निकल जाती है? सच ये हैं कि आज सड़कों का हाल इस देश की हर व्यवस्था जैसा हो चूका हैं, जहाँ रुतबे का सिक्का चलता हैं। पैदलयात्री और साईकलचालक व्यवस्था और समाज दोनों की नज़रों में रह कर भी अस्तित्वहीन हो चुके है। मोटरगाड़ियां हमारी समाज की सच्चाई बन चुके हैं। एक ऐसा समाज जो ताकतवर के गुड़गान गाता हैं और उसके जैसा ही बन जाना चाहता हैं।
कमज़ोर को धक्का मारते हुए उसके हक़ को छीनने की सामाजिक संस्कृति का ही एक स्वरुप है सड़कों पर बढ़ते वाहनों द्वारा ये अतिक्रमण। इस वैचारिक अतिक्रमण को कितना भी व्यवहारिकता के बहाने अस्वीकार करने की कोशिश की जाए पर कोई भी तर्क नाकाफी हैं ये दिखाने में कि चंद उदाहरणों को छोड़कर देश में कहीं भी मुक़म्मल रूप से पैदलयात्रियों के हक़ में सवाल उठें हैं। साइकल और पदयात्रा के मुद्दे पर अगर कुछ उच्च वर्गीय और इनका महिमामंडन करने वाले ऊपरी मध्यम वर्गीय लोगों का ध्यान अब जाने भी लगा हैं तो उसकी वजह है कि अब आग उनके घर तक पहुंच चुकी हैं। और वो आग है बेहद खतरनाक हो चुके प्रदुषण की। बिलासपुर के ये वर्ग अभी इंतज़ार मे है ऐसी आग के घर पहुँचने के। इसलिए यहाँ इस मुद्दे को लेकर न ही कोई चिंता है और न ही किसी प्रकार का शोर। पर अब इस अचिंतित सन्नाटे को भेद कर पैदलयात्रियों और साइकलचालकों द्वारा अपने हक़ को लेने की ज़िद्द छेड़ी जाएगी।
किसे और कैसे प्रभावित करती है सड़क व्यवस्था की असमानता
ज़िंदा लोग ज़िंदा सवालों पर सोचते हैं।
– प्लेखनाव, रुसी क्रांतिकारी मार्क्सवादी चिंतक
सामाजिक न्यायपरस्ता – परिवहन व्यवस्था, आजीविका और गरीबी मे बहुत ही बड़ा सम्बन्ध होता है, खासकर विकासशील देशों में। गैर-मोटराइज़्ड वाहन सामाजिक और हाशिये पर रहने वाले तपकों के लिए फायदेमंद होता है, जैसे गरीब, बीमार, बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे। बाई साइकिल पोटेंशियल डॉट ओआरजी द्वारा किये गए परीक्षणों के अनुसार साइकिल एक गरीब परिवार की आय में 35% वृद्धि कर सकती है।
सड़क जाम – प्रचलित या सही शब्दों मे कहा जाए तो प्रचारित समझ के विपरीत साइकिल यातायात गति को प्रभावित नहीं करता है। साइकिल या कोई भी अन्य गैर-मोटराइज़्ड वाहन निजी वाहनों के मुकाबले 5 गुना कम स्थान घेरतें है। स्थान घेरने के आधार पर कारों की कार्यक्षमता बहुत ही काम है। कारों का सड़क पर घिरे स्थान और यात्रीसंख्या का अनुपात इसे साफ़ दिखाता है।
सड़क हादसे – साइकिल चालकों और पैदल यात्रियों की वजह से होने वाले सड़क हादसों का प्रतिशत बहुत ही कम पर वहीँ सड़क हादसों के शिकार होने में इनका नाम सूचि में सबसे ऊपर आता है। भारत सरकार के परिवहन मंत्रालय के अनुसार साइकिल चालक 5% हादसों में और पैदल यात्री 64% में समबन्धित होते हैं। तमाम सरकारी आकड़ों और गैर सरकारी शोध के अनुसार साइकिल चालकों और पैदल यात्रियों के लिए सड़कें सबसे ज़्यादा खतरनाक है।
प्रदुषण और वातावरण – साईकिल और पैदल यात्रा किसी भी प्रकार के प्रदुषण में योगदान नहीं देते है। यह दोनों ही यातायात के सबसे अधिक पर्यावरण अनुकूलित साधन है। बढ़ते प्रदूषण स्तर में इसका उपयोग बढ़ेगा ही, इसलिए इसके लिए व्यवस्था सुनिश्चित करने का तार्किक औचित्य बनता है।
दिल्ली में हो रही सड़क पर लोकतंत्र लाने की कोशिश
दिल्ली में राज्य सरकार ने सड़क पर लोकतंत्र स्थापित करने की दिशा में अपने रोड रेडिज़ाइनिंग परियोजना के अधीन 1200 किमी सड़क ली है। यूरोपीय शहरों की तर्ज पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने, साइकलिंग और सड़कों को पैदल चलनेवालों और फिजिकली चैलेंज्ड के लिए सहूलियत वाला बनाया जाने की इस परियोजना में 5000 करोड़ का खर्च किया जाएगा। इसके साथ ही सड़क किनारे बतिहने की सुविधा, ग्लास लिफ्ट, सौर्य ऊर्जा संचालित स्ट्रीटलाइट्स और रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी लगाया जाएगा। इसके अलावा हॉकर्स के लिए भी जगह बनाने का सराहनीय फैसला लिया गया है। इस योजना में पहली प्राथमिकता पैदल चलने वाले और सार्वजनिक परिवाहन को दिए जाने का महत्वपूर्ण फैसला भी लिया गया है।
सड़क पर सामान अधिकारों के लिए अनूठे आंदोलन
सायक्लोविया – कोलंबिया के बोगोता शहर में दिसंबर 1974 में संयोजक जेम ऑर्टिन मरीनों और अन्य साईकल विशेषकों ने सड़क पर लोगो के अधिकार के लिए ‘सायक्लोविया’ नाम की एक मुहीम शुरू की, जिसमे लोगों ने सड़कों को वाहनों से मुक्त कर, उसका उपयोग पैदल चलने और साईकल चलाने के लिए किया। इसके ज़रिये उन्होंने पैदल यात्रियों और साईकल चालकों के लिए बेहतर सुविधा और सुरक्षित व्यवस्था की मांग की। 1976 बोगोता के मेयर ने इसे नगर सरकार का आधिकारिक कार्यक्रम घोषित कर परिवहन विभाग द्वारा इसका समर्थन देने का कदम उठाया। आज बोगोता, साएली, मेडेलिन और अन्य नगर पालिकाओं में कुछ मुख्य सड़कों पर, सुबह 7 बजे से दोपहर 2 तक, प्रत्येक रविवार और सार्वजनिक अवकाश के दिन, कारों के आवागमन को बंद कर धावक, स्केटरों, और साइकिल के लिए पूरी जगह दे दी जाती है।
सायक्लोविया की तर्ज पर दुनिया के कई देशों के कई शहरों में अलग-अलग नामों ने ऐसी ही मुहीम छेड़ी गयी। ऑस्ट्रेलिया का ‘बाइक एंड स्ट्रीट फेस्ट’ और ‘सिडनी रोड स्ट्रीट पार्टी’, अर्जेंटीना का ‘कॉले रीक्रिएटिव’ और मेक्सिको का ‘वाया रेक्रेटिव’। इसके अलावा बेल्जियम, ब्राज़ील, कनाडा, चिली, कोस्टा रिका, इक्वेडोर, न्यूज़ीलैंड, अमेरिका और इज़राइल जैसे विभिन्न मुल्कों के कई शहरों में ऐसे ही प्रयोगात्मक पहल की गयी। इन तमाम कोशिशों के परिणामानुसार स्थानीय प्रशासनों पर दबाव बना पैदल यात्रियों और साईकल चालकों के हक़ और उनके लिए पर्याप्त व्यवस्था के हक़ में फैसले हासिल किये गए।
भारत में भी हो रहा मंथन अब
सायक्लोविया से प्रेरित ‘राहगीरी’ नाम से एक पहल शुरू हुई। ‘राहगीरी डे’ के नाम से गुड़गाव में इसकी शुरुआत हुई जहां रविवार को लोग प्रशासन की सहायता से शहर एक एक हिस्से को हर तरह की मोटर वाहनों से मुक्त कर वहाँ पैदल चलने, साईकल चलाने और अन्य मनोरंजक शारीरिक व्यायाम गतिविधियों के लिए उपयोग में लिया जाता है। इस मुहीम ने रास्तों को सार्वजनिक स्थलों के रूप में रख, शहरी गतिशीलता के मायने बदल दिया है। राहगीरी के परिणामस्वरूप गुडगाँव में अब तक ८ किलोमीटर का साईकल ट्रैक तैयार किया जा चूका है। दिल्ली में भी १२६० किलोमीटर के सड़कों की रीडीसाइनिंग कर शहर के मुख्य सड़कों पर फूटपाथ और साईकल ट्रैक की परियोजना तैयार की गयी है। राहगीरी का मकसद है यह दिखाना कि सड़कें सिर्फ वाहनो के लिए नही, पैदलयात्री और सीकल चालकों के लिए भी है।
बैंगलोर मे भी ‘बैंगलोर साइकिल डे’ के नाम से हर महीने की आखिरी रविवार को प्रशासन की बंद सड़कों पर गाड़ियों को प्रतिबंधित कर दिया जाता है। इसकी शुरुआत अक्टूबर 2013 मे हुई।
कोलकाता में लगे साइकिल बैन के खिलाफ चक्र सत्याग्रह
कोलकाता मे 174 सड़कों पर किसी भी प्रकार के नॉन-मोटराइज़्ड वाहन पर प्रतिबन्ध लगने पर सिविल सोसाइटी के लोगों के द्वारं संगठित रूप से विरोध प्रदर्शन किया गया। उन्हें चिंतन शिवरों, रिसर्च द्वारा तर्कों और अन्य कदमों के ज़रिये इस प्रतिबन्ध को 62 सड़कों तक सीमित करवाने मे सफलता मिली।
इंदौर में पैदल यात्रा और साइकिल यात्रा के अधिकार और रैलियाँ उसके लिए सड़क पर व्यवस्था की मांग को लेकर चिंतन शिविर और रैल्यां आयोजित हुई जिसमे देश के विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।
हमारी सड़क, हमारा अधिकार
नागरिकों द्वारा सड़क पर चलने और साइकिल चलाने की आज़ादी और अधिकार के लिए रैली। इस रैली का उद्देश्य होगा पैदल यात्रा और साइकिल यात्रा के लिए सुदृढ़ व्यवस्था की मांग करना। रैली की शुरुआत शहर के विभिन्न छेत्रों से होगी और इसका समापन होगा कलेक्टोरेट में ज्ञापन देकर। ज्ञापन में पैदल यात्रियों और साइकिल यात्रियों के लिए सड़क पर सुविधा, सुरक्षा और स्थान की शासन से मांग की जाएगी। सही तरीके के फूटपाथ, ज़ेबरा क्रासिंग, साइकिल ट्रैक और अन्य ज़रूरी व्यवस्था इन मांगों में होगी। सड़क पर सामान अधिकारों की इस ज़िद्द से जुड़ने के लिए इस रैली में नागरिकों के लिए ये एक आह्वान है। दिनांक – 9 अप्रैल
सड़क पर चलने वाले विभिन्न लोगों और साइकिल सवारों से मिल कर सड़क पर होनी वाली उनकी समस्याओं को जाना गया। शहर के विभिन्न छेत्रों में इस मुद्दें पर बातचीत और सर्वेक्षण किया गया।
आने वाले दिनों में क्या कदम उठाये जायेंगे –
साइकिल चालकों को रेडियम वितरण कर उनकी साइकिलों पर रेडियम लगाया जायेगा। इनमें मज़दूरों पर विशेष ध्यान दिया जायेगा।
दिनांक – 13 मार्च। समय – सुबह 6 बजे और शाम 7 बजे। स्थान – सीपत रोड, रतनपुर रोड, तखतपुर रोड।
जिन मुख्य चौराहों पर ज़ेबरा क्रासिंग नहीं है वहाँ उदाहरण के लिए ज़ेबरा क्रासिंग बनायीं जाएगी।
दिनांक – 20 मार्च। स्थान – अग्रसेन चौक, नेहरू चौक।
अस्थायी फूटपाथ या चलने की जगह का निर्माण सड़क पर पेंट से रंग कर बनाया जायेगा।
दिनांक – 27 मार्च। स्थान – अग्रसेन चौक, नेहरू चौक।
(Originally written for and published in Ziddi Indian in March, 2016)

डिवाइडरों से जुड़े हादसों को इक्का-दुक्का कहकर प्रशासन ने ‘यात्री अपनी सुरक्षा की स्वयं ज़िम्मेदार हैं’ वाला रवैय्या अपनाया हुआ हैं। शहर के ये कुपोषित डिवाइडर यातायात को सही तरीके से ‘डिवाइड’ कर पाये न पाये पर शहरवासियों की हड्डियाँ ज़रूर ‘डिवाइड’ कर सकते हैं। और अगर कहीं डिवाइडरों ने बख्श दिया तो अचानक से प्रकट होने वाले स्पीड ब्रेकर निबटाने के लिए तैयार बैठे हैं। सीपत रोड, मुख्य डाकघर चौक, मंगला चौक, हरिभूमि चौक, ईदगाह चौक और अन्य मार्गों पर भी स्ट्रीट लाइट्स न होने से स्थिति बदहाल बनी हुई हैं। डिवाइडरों पर रिफ्लेक्टर लगाने, मीडियन एज लाइन बना उस पर रोड स्टड्स लगाने और स्पीड ब्रेकरों के लिए चेतावनी लगाने जैसे आसान कामों को कर सड़क व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता हैं। इनका खर्च सड़क, डिवाइडर बनाने में ही हैं सम्मिलित हैं और इनका किसी भी प्रकार का कोई अतिरिक्त आर्थिक भार नहीं हैं। साफ़ हैं की यहाँ मामला आर्थिक नहीं किन्तु प्रशासन की इच्छा और नियत का हैं।
इंडियन रोड कांग्रेस के अनुसार सडकों पर डिवाइडरों और अन्य वस्तुओं की मार्किंग के दिशा निर्देश और शहर की सडकों पर उनके अमल में फर्क कुछ इस प्रकार हैं–
• डिवाइडरों को सामान्य पेंट की जगह गर्म थर्मोप्लास्ट मटेरियल और ग्लास बीड्स से रंगा जाना चाहिए। इससे एक तरह के रेट्रोरिफ्लेक्टिव सतह बनती हैं जो रात के वक़्त सामान्य हेडलाइट्स में स्पष्ट दिखाई देती हैं। काली-सफ़ेद रंग की पर्यायक्रमिक पट्टियों को आम स्थानों पर, और काली-पीली रंग की पर्यायक्रमिक पट्टियों को जोखिमभरे स्थानों पर डिवाइडरों पर इससे रंगा जाना चाहिए।
• डिवाइडरों के पहले डिवाइडर बैरियर लगाए जाने चाहिए जिन्हें पीली और काली रेट्रोरेफ्लेक्टिवे टेप से चिन्हित किया जानी चाहिए।
• डिवाइडरों से 350मीमी की दुरी पर सड़क पर थर्मोप्लास्ट मटेरियल और ग्लास बीड्स से रेखा खींची होनी चाहिए जिसपर भूरा पीले रंग के रोड स्टड्स लगाया जाना चाहिए। इससे सड़क के घुमाव और मोड़ का आभास होने में मदद मिलती हैं।
• सड़कों किनारे वाले वस्तुओं जैसे पेड़ जो सड़क में राह पर आते हो उन्हें रेट्रो रिफ्लेक्टिव ऑब्जेक्ट हैजर्ड मार्कर्स से रंगा जाना चाहिए। जिस तरफ से यातायात आ रहा हो उसके अनुसार इन पर कम से कम पांच काली-पीली रंग की पर्यायक्रमिक पट्टियों से रंगा जाना चाहिए।
• डिवाइडर व अन्य वस्तुओं के कुछ दूर पहले से उन तक पहुचती हुई ‘चैनलाइसिंग’ रेखाएं सड़क पर बनायीं जानी चाहिए। ये रेखाएं तिरछी होनी चाहिए और थर्माप्लास्टिक पेंट का ही उपयोग किया जाना चाहिए।
• स्पीड ब्रेकरों के 5मीटर पहले चेतवानी संकेत बनाये जाने चाहिए। साथ ही ब्रेकरों के सामने सफ़ेद रेखा थर्माप्लास्टिक पेंट से बनायीं जानी चाहिए।
किसी भी प्रकार की मार्किंग के लिए थर्मोप्लास्टिक पेंट ही उपयोग में लिया जाना चाहिए। थर्मोप्लास्ट पेंट की गुडवत्ता के असली नमूने की जांच उसे लगाते वक़्त ही होनी चाहिए जिससे प्रयोग में लिए गए पदार्थ में कोई धोखा न हो। प्रासंगिक नियम और विवरण में सूचित न्यूनतम प्रदर्शन स्तर को सुनिश्चित किया जाना चाहिए और किसी भी प्रकार की कमी होने पर पुनः रोड मार्किंग की जानी चाहिए।
भारतीय दण्ड संहिता धारा 283
भारतीय दण्ड संहिता धारा 283 के अनुसार सड़क पर मौजूद किसी भी तरह का अवरोध जिसके कारण किसी को भी खतरा, चोट और बाधा पंहुचा सकता हैं, उसके मालिक या उस पर अधिकार रखने वाले को 200 रूपये जुर्माने की सजा हो सकती हैं। इसका मतलब अगर डिवाइडर न दिखने की वजह से कोई हादसा होता हैं तो मामला सिर्फ रैश ड्राइविंग का नहीं हो सकता। डिवाइडर के गलत बनावट और न दिखने में ज़िम्मेदारी प्रशासन की हैं।
मुख्य डाक घर के पास 12 तारीख को शाम छह बजे ऐसे ही कुछ हुआ तो बिना कुछ देखे-सुने कुछ लोगों ने भी कह दिया “पी के चला रहा है”। आस पास के लोगों की मशक्कत के बाद गाड़ी निकली और ड्राइवर ने बताया कि उन्हें डिवाइडर नहीं दिखा। बहुत से लोगों ने उस डिवाइडर को खतरनाक भी बताया। प्रशासन ड्राइवर पर सारा दोष मढ़ने वाली बात को सच माने हुआ हैं और शहर में रोज़ किसी न किसी डिवाइडर पर खतरों का यही खेल चालु हैं।
ज़िद्द की मुहिम
इस विषय को गंभीरता से लेते हुए ज़िद्द ने समस्या और इसके समाधान पर नागरिकों, विशेषज्ञों और अधिकारीयों से विचार-विमर्श किया। जिद्दियों ने दूरगामी परिणामों का महत्व समझते हुए इस विषय में नगर निगम को आवेदन दिया और रिफ्लेक्टर तथा अन्य वस्तु ऑबजेक्ट मार्किंग की वर्तमान स्थिति के लिए आरटीआई दायर किया। इसके अलावा ज़िद्द द्वारा इस मुद्दे पर जनहित याचिका दायर की जाने वाली हैं जिसके ज़रिये डिवाइडर, स्पीड ब्रेकर और अन्य ऑब्जेक्ट मार्किंग की वर्तमान स्थिति और दिशा-निर्देशों के भारी अंतर पर प्रशासन की जवाबदेही तय करना मकसद हैं। इन मुद्दों पर न्यालय के ज़रिये प्रशासन से समाधान करवाने के लिए ये निर्णय लिया गया। जिद्दियों ने नागरिकों की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता देते हुए खुद रिफ्लेक्टर लगाने का बीड़ा भी उठाया। लगातार संगठित प्रयास के बल-बूते ज़िद्दी डेढ़ सौ से अधिक डिवाइडरों पर रिफ्लेक्टर लगाने में कामयाब हुए। इस सफल कदम से कुछ नहीं तो इतना तो साफ़ हैं कि अगर निगम प्रशासन चाहे तो इस समस्या का निबटारा आसानी से कर सकता हैं। ऑबजेक्ट मार्किंग और स्ट्रीट लाइट्स के नियमानुसार कार्यान्वयन से निगम अपनी ओर से इस समस्या को सुझा सकता हैं। वहीँ दूसरी ओर वाहन चालक भी लो बीम हेडलाइट्स के प्रयोग से ऐसी घटनाओं को टाल सकते हैं। ये दोनों ही आसानी से निर्वाह किये जा सकने वाली ज़िम्मेदारियाँ हैं। अगर हम अपनी ऐसी छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करने लग जाएं तो आधी समस्या तो वैसे ही समाप्त हो जाएगी।
(Originally written for & published in Ziddi Indian in February, 2016)

हरी चादर को ओढ़े तालापारा तालाब की ये तस्वीर ‘गो ग्रीन’ का सन्देश तो नहीं देती, परन्तु तालाबों पर डेरा डाले जंगली घास और जल्कुम्भियों का नज़ारा ज़रूर पेश कर रही हैं। शहर के लघभग सभी तालाबों का यही नज़ारा है, फर्क है तो बस कचरे, जंगली घास और गंदे पानी के अनुपात का। दिपुपारा तालाब में जल्कुम्भियों का राज है तो तालापारा में जल्कुम्भियों और कचरे की सामान साझेदारी है। इस हिसाब में मामा-भांजा तालाब ने बहुत ही लोकतांत्रिक रवैया अपनाया हुआ है, वहाँ नाले के पानी को भी सामान स्थान प्राप्त है।
अगर हम अपने शौचालय से निकलने वाले पानी को बहाने की बजाये अपने बैठक में सजा कर रखें, मामा भांजा तालाब की स्थिति कुछ ऐसी ही है। शहर के काफी बड़े नाले इस तालाब पर खुलते हैं और बिलासपुर के मध्य स्थित इस जगह की सुंदरता बढ़ाते हैं। मामा-भांजा तालाब मे होने वाले जलनिकास की वजह से, लघभग चार साल पहले हुए जंगली घासों को हटाने के प्रयास भी दूरगामी परिणाम देने में विफल रहे। छेत्र के निवासियों का कहना है कि सफाई के कुछ महीनों में ही जंगली घास दोबारा उगने लगे। नाली के पानी के निकास और कचरे के जमा होने कि वजह से भूमि-जल भी प्रदूषित हो चूका है। ‘एच2 एस किट’ से पास के बोरिंग के पानी की जांच करने पर पाया गया कि वह पीने योग्य नहीं है। ज़हरीले पानी के उपयोग से तमाम तरह की गंभीर बिमारियों का खतरा बना हुआ है। साथ ही नाले के पानी के जमा होने से जल जनित बिमारियों की भी सम्भावना हुई हैं। यहां तक कि गंदगी की वजह से बिमारियों के फैलने की पुष्टि भी नागरिकों ने की हैं। नालों के निकास का एक परिणाम ये भी हुआ की आज कोई मां भांजा तालाब जाये तो उनका स्वागत प्रवेश पे बैठे सूअर कर रहे होंगे। इन छेत्रों में कूड़ेदानों का कोई नामो-निशाँ नहीं है। कूड़ादान न होने की कमी कुछ इस तरह पूरी हुई है कि आज पूरा तालाब ही एक विशाल कूड़ेदान का रूप लेने की कगार पर है।हर थोड़े दिन में कोई न कोई बीमार पड़ जाता है। इलाज में कम से कम 1000-2000 रूपये लग ही जाते हैं। मच्छरों ने जीना हराम कर रखा है। हर बीमारी में डेंगू होने का डर लगा रहता है। – निवासी टिकरापारा।हमने इस सन्दर्भ में कुछ डॉक्टरों से भी बात की, जिनका कहना है तालाबों में गंदगी की वजह से लोगों को बहुत सी बीमारियां हो सकती हैं। स्थिर जल में गंदगी डेंगू के मच्छरों को न्वेता देती है। मामा भांजा तालाब की गंदगी डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी के महामारी का कारण भी बन सकती है। तालाब में नालों के निकास की वजह से सालों से मल इकठ्ठा हो रहा है, जिससे कॉलरा, हेपेटाइटिस ‘ए’ एवं ‘इ’ हो सकता है। अगर तालाब भू-जल को प्रभावित कर रहा है तो आस पास के बोरिंग व हैंडपंप का पानी पीने वाले लोगों को दस्त एवं डिसेंट्री जैसे जलजनित रोगों का खतरा है। भारत में हर साल १ लाख बच्चे दस्त से मरते हैं। इसलिए जल स्रोतों का साफ़ रहना अति आवश्यक है।
कैसे दिख सकते हैं बिलासपुर के तालाब
किताबों में पढ़ कर भूल चुके हजारों पर्यावरण के फायदों के अलावा भी तालाबों के कई फायदे हो सकते हैं।
मछलीपालन कर तालाबों का संरक्षण करने के साथ-साथ उन्हें आय का स्रोत बनाया जा सकता है। मछलीपालन कर तालाबों को आर्थिक उपयोग में लाने के तमाम उदाहरण है। उपयुक्त तरीके के मछलीपालन को शहर के विभिन्न तालाबों में प्रयोग मे लाया जा सकता है। इसके अलावा छोटे स्तर पर खेती भी की जा सकती है। मछलीपालन से उस खेती की गुड़वत्ता में भी वृद्धि की जा सकती है। सौंदर्यीकरण करके उन्हें मनोरंजन का स्थान भी बनाया जा सकता है, बशर्तें उसे सुरक्षित और अनुरक्षित रखा जाये, वरना दिपुपारा तालाब का हाल सबके सामने है।
तालाबों को बचाने के कुछ तरीके
बारिश के पानी को संगृहीत कर तालाब में डालना। इससे तालाब में पानी का स्तर हमेशा बना रहेगा
– तालाबों में फव्वारे बनाना। इससे तालाब को ऑक्सीजन मिलता है जिसका उपयोग कर लाभकारी बेक्टेरिआ गंदगी खत्म करते हैं।
– तालाबों का सौंदर्यीकरण कर उन्हें रेलिंग से घेरा जाए। इससे बाहर से फेंके जाने वाले कचरे को जमा होने से रोक जा सकता है।
– तालाबों को पटने से बचाया जाना चाहिए जिससे न तो उस पर अवैध गृह निर्माण हो सके और न ही हेराफेरी से उस पर कोई विशालकाय मॉल खड़ा किया जा सके।
– जल स्रोतों की देखभाल के लिए अलग महकमा तैयार किया जाना चाहिए। साप्ताहिक, मासिक और वार्षिक लक्ष्य बनाया जाना चाहिए और महकमे की जवाबदारी तय होनी चाहिए।
– तालाबों को उनकी मौजूदा स्थिति से विलुप्त होने में समय के अनुसार श्रेणियों में बांटा जाए और उस अनुसार ही उनके संरक्षण के प्रयास किये जाए।इन तरीकों से तालबों को बचाया जा सकता है।
जिद्दियों के ये तरीके सिर्फ कागज़ी नहीं हैं। मामा भांजा तालाब की सफाई होते ही टीम का एक हिस्सा उपरोक्त समाधानो को नगर निगम बिलासपुर पहुंचाएगा और बिलासपुर के सभी तालाबों को फिर से जन्म देने में लग जाएगा।
मामा और भांजा को पुनर्जीवन देने की ज़िद्द
गुरूघासीदास विश्वविद्यालय के बी.एस.सी पर्यावरण अध्ययन के एक छात्र ने तालाबों की लेकर अपनी चिंता के कारण तालाबों की सफाई की पहल छेड़ी और ‘ज़िद्द’ ने इस विचार को एक ज़िद्द में परिवर्तित कर दिया। ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ और ‘नेचर क्लब’ ने इस मुहीम में हिस्सा लेकर ज़िद्द के साथ शहर के तालाबों का सर्वे किया। सर्वे में मामा भांजा तालाब की स्थिति काफी गंभीर पाई गयी। नगर निगम से इस विषय में बात करने पर ज्ञात हुआ कि मामा भांजा तालाब एक निजी संपत्ति है, इसलिए नगर निगम उसकी सफाई में कोई सहयोग नहीं कर सकता। इस वार्तालाप से यह भी पता चला तालाब की स्थिति विगत 10 वर्षों से ऐसी ही है और अगर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले 10 वर्षों में इससे बदत्तर ही होगी। तालाब की सफाई मे इतनी उलझन को देख लोगों का हौसला और बढ़ गया और नागरिक, बिना किसी सहयोग ही, सफाई करने में जुट गए। तालाब पर जाने के तीनो रास्तों पर कचरे का ढेर जमा हुआ था। जिद्दियों ने 1 नवंबर से सफाई अभियान शुरू किया और कचरा साफ़ कर रास्ता बनाया। इस अभियान में 40 से ज़्यादा लोग शामिल हुए और एक ही दिन में परिणाम दिखने लगा। तालाब को अंदर से साफ़ करने, मलबा हटाने और सीवेज के निकास को बंद करवाने हेतु नगर निगम की सहायता की आवश्यकता थी परन्तु नगर निगम ने निजी संपत्ति कार्यछेत्र के बाहर बताया।‘नगरपालिका विधि संहिता की धारा 220 के अनुसार परिषद् किसी भी जल प्रदाय के स्रोत के मालिक या उस पर नियंत्रण रखे वाले किसी व्यक्ति से अपेक्षा कर सकती है कि वह विनिर्दिष्ट किये जाने वाले युक्तिसमय के भीतर जल प्रदाय के स्रोत को गाद, कचरा और सड़ी-गली वनस्पतियों से साफ़ रखे, या ऐसा जल स्रोत जिसका उपयोग, उसके पास से गुज़रना और वहाँ पहुंचना स्वास्थ या सुरक्षा के लिए खतरनाक होता है, उसकी 24 घंटे में मरम्मत करे। अगर मालिक यह करने में असफल रहे तो परिषद् इस कार्य का निर्वाहन कर, इसका खर्च मालिक से वसूल करेगी।‘मालिकी के खींचतान में लोगों का स्वस्थ और शहर की सुंदरता प्रभावित हो रही हैं। ज़िद्द ने लोगों को जगाने औए तालाब सफाई के पक्ष में खड़े होने के लिए एक हस्ताक्षर अभियान शुरू किया। पार्षद की मनाही के बावजूद भी आस पास रह रहे 79 लोगों ने हस्ताक्षर कर अपना सहयोग दिखाया। यह पत्र नगर निगम आयुक्त को जन दर्शन में दिया गया, जिसकी प्रतिलिपि कलेक्टर और महापौर को पहुंचाई गयी। ज़िद्द के इस अभियान से प्रभावित हो कर आयुक्त ने तुरंत सफाई के लिए एक टीम बनायी और उसे तालाब रवाना किया। इंजीनियर तिर्की को अगले जनदर्शन से पहले तालाब में सीवेज का निकास बंद करवाने की योजना बनाने का आदेश दिया गया।
(Originally written for & published in Ziddi Indian in December, 2015)

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